रात फिर भी रात है
कुछ खास नहीं फिर भी एक बात है
पूर्णिमा ही सही रात फिर भी रात है ,,
बेटी तू सीख इनसे डरना, वरना,,
न जाने कितने प्रश्न वाचक चिह्न
तुझे देखेंगे ,परिहास करेंगे और कहेंगे,
गलती तुम्हारी ही थी
इतनी रात में घर से बाहर क्या कर रही थी??
तुझे ये कहने का मौका भी न देंगे की तेरी
बीमार माँ घर में अकेले मर रही थी ..
दवा की तलाश में तूने जिसे भगवान समझा
वो शैतान था ,तेरे आंसुओं चीखों से पिघला नहीं,
खुद को मर्द समझता वो हैवान था ..
मै मर भी जाऊ तो भी ,,
मेरी बिटिया तू बाहर न निकलना,,
दरवाजा बंद कर अंदर ही रोना बिलखना
जाने तेरा मेरा कितने पलों का साथ है
पूर्णिमा ही सही रात फिर भी रात है ....
पूर्णिमा ही सही रात फिर भी रात है ...